Wednesday, October 1, 2014

अपील

जम्मू-कश्मीर में सितम्बर माह के प्रथम सप्ताह में आई बाढ़ व भू-स्खलन के कारण आम मेहनतकशों को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ‘नागरिक’ व जनपक्षधर संगठनों के संयुक्त प्रयास से बने ‘जम्मू-कश्मीर आपदा राहत मंच’ के जरिये वहां कुछ स्थानों पर मेडिकल कैम्प लगाये जा रहे हैं। ‘नागरिक’ अपने पाठकों व शुभेच्छुओं से इस हेतु बढ़-चढ़ कर मदद करने की अपील करता है। पिछले वर्ष उत्तराखण्ड में आई आपदा के समय इकट्ठे किये गये धन से बची राशि के द्वारा मेडिकल कैम्प शुरू किया जा चुका है। आप स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया रामनगर (नैनीताल) उत्तराखण्ड के निम्न अकाउण्ट के जरिये आर्थिक योगदान कर सकते हैं।
‘नागरिक अधिकारों को समर्पित’ 
खाता संख्याः 30488926725
सम्पर्क हेतु फोन नम्बरः 7500714375

कश्मीर आपदा: दोषी कौन?

वर्ष-17,अंक-19  (01-15 अक्टूबर, 2014)
धरती का स्वर्ग कही जाने वाली कश्मीर घाटी आज भयानक आपदा का शिकार है। वहां की डल झील लगभग समूची कश्मीर घाटी को निगल चुकी है। झेलम नदी का तांडव सैकड़ों लोगों की जानें ले चुका है। ऐसे में सहज ही सवाल उठ खड़ा होता है कि इस आपदा का जिम्मेदार कौन है? क्या यह आपदा प्रकृति द्वारा लायी गयी ऐसी आपदा थी जिसके आगे मानव जाति असहाय है या फिर से एक ऐसी आपदा थी जो समय रहते रोकी जा सकती थी। जान-माल के भारी नुकसान से बचा जा सकता था। और अगर ऐसा था तो ऐसा क्यों नहीं किया गया?
हमारे देश में एक परंपरा सी चल पड़ी है कि वर्षा, बाढ़, भूस्खलन सरीखी घटनाओं को प्राकृतिक आपदा की तरह पेश कर दिया जाय। हमारे देश का शासक वर्ग और सरकारें ऐसा ही करती हंै। वे देश की भोली-भाली मेहनतकश जनता को यह झूठी घुट्टी पिलाते हैं कि प्रकृति के इस कहर से बचना असंभव था। इस वर्णन से शासक वर्ग अपनी उन करतूतों को छिपा ले जाते हैं जिससे प्रकृति को कहर बरपाने की ओर ढकेला गया है। शासकों ने प्राकृतिक आपदा का राग उत्तराखण्ड आपदा के समय भी गाया और अब कश्मीर के वक्त भी गाया जा रहा है।

अमेरिकी साम्राज्यवादी और आई.एस.आई.एस.

वर्ष-17,अंक-19 (01-15 अक्टूबर, 2014)
        अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने आई.एस.आई.एस. से लड़ने के लिए तीस देशों का एक गठबंधन बना लिया है। यह खबर किसी चीज की याद दिलाता है? हां! यह एकदम चिरपरिचित लगता है। इसके पहले अमेरिकी साम्राज्यवादी तालिबान से लड़ने के लिए कई देशों का गठबंधन बना चुके हैं और फिर अलकायदा से लड़ने के लिए। इसके भी बहुत पहले वे सोवियत राक्षस से लड़ने के लिए चार दशकों तक नाटो नाम का गठबंधन बना और चला चुके हैं।
यह चिरपरिचित कहानी असल में पिछले पांच-छः दशकों से अमेरिकी साम्राज्यवादियों की रणनीति रही है, सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी गतिविधियां करने के लिए। सोवियत संघ और सोवियत खेमा तो उनकी इच्छा और विरोध के बावजूद अस्तित्व में आया था परंतु तालिबान, अलकायदा और अब आई.एस.आई.एस. को खुद इन्होंने ही पाल-पोस कर बड़ा किया था।

टूटते गठबंधन

वर्ष-17,अंक-19 (01-15 अक्टूबर, 2014)
        पहले हरियाणा और फिर महाराष्ट्र में स्थापित गठबंधन विधानसभा चुनाव के पहले बिखर गये। जिस गठबंधन के टूटने से सबसे ज्यादा शोर मचा वह भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का 25 वर्ष पुराना गठबंधन है। इस गठबंधन के टूटने के चंद घंटे बाद ही महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस का भी गठबंधन टूट गया। कांग्रेस के जहाज को डूबता देख शरद पवार की पार्टी उससे बाहर कूद पड़ी।
लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल कर केन्द्र की सत्ता में काबिज भाजपा ने हरियाणा व महाराष्ट्र में अपनी शर्र्ताें पर गठबंधन चाहा था परन्तु दूसरे दलों ने भाजपा के सामने झुकने से इंकार कर दिया। जहां तक कांग्रेस पार्टी की बात है, यह अनुमान लगाया जा रहा है कि क्योंकि दोनों ही राज्यों में उसके नेतृत्व में सरकार रही हैै अतः दुबारा सत्ता में उसका वापस लौटना मुश्किल है। कांग्रेस पार्टी का स्थान लेने का दावा भाजपा का है और उसे उम्मीद है कि वह, वह करिश्मा पुनः दोहरा लेगी जो उसने चंद माह पहले आम चुनाव में दिखाया था। हालांकि इस बाद की संभावना पर ग्रहण हालिया उपचुनावों से लग गया है। इन उपचुनावों में भाजपा को झटका लगा है। उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार में वह अपनी उन सीटों को दुबारा नहीं जीत पायी जो उसके पास पहले से थी। नरेन्द्र मोदी का नशा अब हैंग ओवर बन चुका है।

Tuesday, September 16, 2014

ये मंजर पहले भी देखे हैं

16-30 सितम्बर, 2014
पाकिस्तान भारत का ‘छोटा भाई’ है। वैसे चूंकि पाकिस्तान भारत के विभाजन से बना है इसलिए इसे पौराणिक कथाओं के अनुसार भारत का पुत्र भी कहा जा सकता है। जो भी हो, दोनों मामले में  यह कहा जा सकता है कि उसमें भारत के कुछ गुण तो होंगे ही। अगस्त के अंत और सितंबर के उत्तरार्ध ने इसे प्रदर्शित भी किया। 
आज से दो-तीन साल पहले अपने प्यारे हिन्दुस्तान में अन्ना हजारे एवं केजरीवाल एण्ड कंपनी की बड़ी धूम थी। वे भारत को बदल देने के लिए मैदान में उतरे थे। कम से कम वे भ्रष्टाचार को तो पूरी तरह खत्म ही करने वाले थे। यह उस जमाने की बात है जब नरेन्द्र मोदी ने पूरी तरह टी.वी. चैनलों पर कब्जा नहीं किया था। तब वे ही भारत के उद्धारक घोषित किये जा रहे थे। भारत का कायांतरण तब केवल वक्त की बात थी। 

इस्लामिक स्टेट के बहाने सीरिया पर निशाना

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस्लामिक स्टेट आफ इराक एण्ड सीरिया (आई एस आई एस- जिसे आजकल संक्षेप में इस्लामिक स्टेट कहा जा रहा है) के खिलाफ अपने हवाई हमलों की जद में सीरिया को भी ले लिया है। आईएस का इराक व सीरिया के एक बड़े भाग में पिछले वर्षों से कब्जा रहा है। आई एस ने जब अमेरिका के हितों को इराक में गम्भीर खतरा पैदा कर दिया तब उसने अपनी फौज को उसके खिलाफ इराक में पुनः आक्रामक मुद्रा में ला दिया। ध्यान रहे कि यह एक सफेद झूठ है कि ओबामा ने इराक और अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुला ली। इन दोनों ही देशों में अमेरिका ने बगदाद और काबुल में विशाल सैन्य अड्डा कायम किये हुए हैं और ऐसे सैन्य अड्डे पूरे देश में भी फैले हुए हैं। पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य अड्डे कई देशों में है तो भूमध्य सागर, लाल सागर और अरब की खाड़ी में उसकी नौसेना तैनात है।
सीरिया की असद सरकार अमेरिका की आंखों में दशकों से चुभती रही है। वर्ष 2011 के अरब जनउभार का लाभ उठाकर वह असद सरकार को गिराना चाहता था परन्तु उसमें उसे अभी तक कामयाबी नहीं मिल पायी है। उसकी सारी योजनाएं रूसी साम्राज्यवादियों के और ईरान के कारण ही असफल नहीं हुयी बल्कि स्वयं असद सरकार शुरूवाती गम्भीर झटकों के बाद अपनी स्थिति दिनों दिन मजबूत करती चली गयी। असद सरकार ने पिछले कुछ महीनों में आईएस को भी गम्भीर नुकसान पहुंचाया और उसे पीछे हटने को मजबूर किया। परन्तु आईएस का इसके बावजूद सीरिया के एक भाग में कब्जा रहा है। आईएस की इस कार्यवाही में न केवल अमेरिका बल्कि सऊदी अरब सहित कई अरब देश और इजरायल मदद करते रहे हैं। 

जम्मू कश्मीर में मची तबाही: सैकड़ों मरे, हजारों विस्थापित

निकम्मी शासन प्रणाली की पोल फिर खुली

सितम्बर माह के पहले हफ्ते में हुयी भारी बारिश ने जम्मू-कश्मीर में भयानक तबाही फैला दी। 400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं तथा चार लाख से अधिक लोग अकेले श्रीनगर में सितम्बर माह के दूसरे हफ्ते तक भी फंसे हुए थे। इस तबाही में हजारों लोग बेघर हो गये और उनकी गृहस्थी पूरे तौर पर उजड़ गयी। 
इस बाढ़ में ‘जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला की सरकार भी बह गयी’, ऐसा खुद इस राज्य के मुख्यमंत्री का कहना था। श्रीनगर शहर में आई बाढ़ में सरकारी दफ्तर, हाइकोर्ट, सरकारी आवास, टेलीविजन प्रसारण केन्द्र आदि सभी जलमग्न हो गये। जो ‘जलमग्न सरकार’ अपनी ही सुरक्षा नहीं कर सकी वह भला आम जनता को क्या सहायता पहुंचाती। सेना को उतारकर ही पुनः व्यवस्था की जा रही है। जम्मू-कश्मीर में भारी वर्षा व बाढ़ के कारण हजारों लोगों को पलायन भी करना पड़ा है। वे भोजन, दवा, कपड़े, छत आदि के अभाव में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पीने के पानी, रसोई गैस, बिजली, डीजल-पैट्रोल आदि के अभाव और संचार सेवाओं के ठप्प हो जाने के कारण हालात और खराब हो गये हैं।